Teaching of Arithmetic in hindi

अंकगणित का अध्यापन (Teaching of Arithmetic) -

1.भूमिका(Introduction)

Teaching of Arithmetic

Teaching of Arithmetic

अपने प्रारम्भिक दिनों में जब मानव जब कन्दराओं में पेड़ों के नीचे रहता था तब उसे अंकगणित की आवश्यकता नहीं थी। भोजन तथा सुरक्षा के अतिरिक्त उसकी आवश्यकता नहीं के बराबर थी। उसका विशेष ध्यान तत्कालीन सुख-सुविधाओं तक ही सीमित था। जब मानव समूह बनाकर रहने लगा तो उसकी आवश्यकताओं की संख्या बढ़ने लगी और उसे सभ्यता के विकास के साथ हिसाब रखने की आवश्यकता पड़ने लगी। वह अपनी वस्तुओं को गिनने लगा तथा उनके खो जाने पर उनकी कमी महसूस करने लगा। शनैः शनैः वह संख्या की भाषा का प्रयोग करने लगा तथा दूसरों के मुख से सुनकर इसे समझने भी लगा। आरम्भ में वस्तुओं की संख्या का हिसाब भिन्न-भिन्न चिन्हों या वस्तुओं से किया गया।
वस्तुतः मनुष्य को अंकगणित के ज्ञान की आवश्यकता वस्तुओं का लेनदेन करते समय पैदा हुई। आवश्यक औजार, वस्त्र, भोजन आदि को प्राप्त करने के लिए उसके लिए यह आवश्यक हो गया कि वह वस्तुओं के मूल्य को आँके और उनकी तुलना दूसरी वस्तुओं के मूल्यों से करे। सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए अंकगणित का विकास किया तथा संख्या प्रणाली को एक वैज्ञानिक रूप प्रदान किया। वर्तमान जीवन में अंकगणित के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संख्याओं तथा अंकगणित के प्रत्ययों का प्रयोग होता है। ज्यों-ज्यों हमारा जीवन तथा व्यवसाय जटिल होता जा रहा है त्यों-त्यों अंकगणित का प्रयोग भी बढ़ता जा रहा है।
आज हम अंकगणित की अनेक संकल्पनाओं तथा प्रक्रियाओं को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम में लेते हैं। संख्या प्रणाली इनका एक महत्त्वपूर्ण आधार है तथा संख्याओं की विशेषताओं ने ही बीजगणित तथा ज्यामिति को जन्म दिया है। समुच्चय सिद्धान्त तो संख्याओं की विशेषताओं पर ही आधारित है। मानव की इस संख्या प्रणाली को विकसित करने में शताब्दियों तक सतत् प्रयास करना पड़ा है तथा आज भी इसको परिष्कृत करने के प्रयास जारी हैं।
सभ्यता के आरम्भ में जीवन जटिल नहीं था। किन्तु व्यापार तथा जीवन के विकास के साथ ही मानव को नये अंकगणितीय प्रत्ययों का निर्माण करना पड़ा। दशमलव प्रणाली इस शताब्दी की अभूतपूर्व देन है। इसकी खोज के पहले लेन-देन, माप-तौल आदि की इकाइयाँ भिन्न-भिन्न थी तथा उनकी गणना के आधार भी समान नहीं थे। किन्तु दशमलव प्रणाली ने विभिन्न इकाइयों की गणना का आधार समान मानकर, कठिन से कठिन गणना को सरल बना दिया है। शून्य का आविष्कार मनुष्य के मस्तिष्क की अनोखी देन है। यदि आज हमें शून्य का ज्ञान नहीं होता तो शायद गणना की प्रक्रियाओं का स्वरूप बहुत ही अवैज्ञानिक होता और सम्भवतः हमारी प्रगति की मात्रा भी बहुत कम होती। गणना करने के नये-नये उपाय निकाले जा रहे हैं तथा कम्प्यूटर की सहायता से कठिन से कठिन गणना बहुत ही शीघ्र की जा सकती है।
अब तक अंकगणित को एक गणना करने का विषय ही माना जाता रहा है। किन्तु शनैः शनैः गणना प्रक्रियाओं के सरलीकरण से इस मान्यता का महत्त्व कम होता जा रहा है। वस्तुतः अंकगणित में गणना-पक्ष प्रक्रियाओं से सम्बंधित है। अंकों का वैज्ञानिक अध्ययन भी अंकगणित का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। आज अंकगणित का क्षेत्रफल अत्यन्त व्यापक हो गया है। विभिन्न क्षेत्रों में इसका उपयोग होने लगा है। इन क्षेत्रों में अंकगणित का विशिष्ट स्वरूप विकसित हो गया है।
(1.)परिवार अंकगणित (2.)कृषि अंकगणित (3.)बीमा अंकगणित (4.)बैंक अंकगणित (5.)उत्पादन अंकगणित (6.)जनसंख्या अंकगणित (7.)व्यापार अंकगणित (8.)उपभोग अंकगणित (9.)कर अंकगणित (10.)विपत्ति अंकगणित (11.)कम्प्यूटर अंकगणित (12.)खेल अंकगणित) (13.)परीक्षा अंकगणित

2.अंकगणित का अर्थ (Meaning of Arithmetic) -

अंकगणित ग्रीक शब्द से निकला है जिसका अर्थ है 'अंकों का विज्ञान' तथा 'गणना की कला'। अंकगणित में अंकों के सम्बन्धों का वैज्ञानिक अध्ययन तथा गणना की कला में दक्षता सम्मिलित है। गणित के अध्यापकों को चाहिए कि वे अंकगणित के दोनों पक्षों पर बल दें। एक ही पक्ष पर बल देने से अंकगणित का दूसरा पक्ष गौण हो जाता है। अंकों का ज्ञान तथा गणना की कला-दोनों ही पक्ष महत्त्वपूर्ण हैं। अंको के वैज्ञानिक ज्ञान के बिना गणना करने में दक्षता प्राप्त करना कठिन है तथा गणना करते समय अंकों का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। दोनों एक दूसरे से सम्बंधित हैं।
अंकगणित को पढ़ाने के पक्ष में एक प्रबल तर्क यह है कि इसका दैनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण उपयोग है। अंकगणित तथा उसके लिखित प्रतीकों को अर्थपूर्ण बनाने के लिए प्रतिदिन काम में आनेवाली वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए। इस प्रकार विद्यार्थी संख्याओं के प्रत्ययों तथा प्रतीकों का वास्तविक वस्तुओं से सम्बन्ध स्थापित कर अर्थ समझ सकेंगे।

3.अंकगणित में प्राइमरी कक्षाओं में निम्न बातें सिखाना अभीष्ट है(Arithmetic is intended to teach the following things in primary classes) -

Teaching of Arithmetic

Teaching of Arithmetic


(1.)शीघ्रता से गिनने की योग्यता।
(2.)लिखित तथा मौखिक रूप से छोटी तथा बड़ी संख्याओं का जोड़, घटाव, गुणा एवं भाग करने की योग्यता तथा इन पर आधारित समस्याओं करने की क्षमता।
(3.)भिन्न का ज्ञान।
(4.)सिक्कों का ज्ञान तथा उनका संख्यात्मक मान।
(5.)वस्तुओं का क्रय-विक्रय करने की योग्यता। मूल्य आँकने तथा उनसे सम्बन्धित गणना करने की क्षमता। कम्प्यूटर की सहायता से गणना करने की योग्यता।
(6.)अंकगणित के पाठ्यक्रम से सम्बंधित उप-विषयों की सारणियों का उपयोग करने की योग्यता।
(7.)साधारण मापों, बाँटों तथा उनसे सम्बन्धित गणना प्रक्रियाओं का ज्ञान।
(8.)लम्बाई तथा दूरी मापने की इकाइयों का ज्ञान तथा उनसे सम्बन्धित गणना-प्रक्रियाएं करने की योग्यता।
(9.)अंकगणित के सिद्धान्तों को जीवन की समस्याओं को हल करने के काम में लाने की क्षमता।
(10.)अंकगणित एवं ज्यामिति का समन्वित अध्यापन।

4.अंकगणित अध्यापन के उद्देश्य (Objectives of Teaching of Arithmetic) -

(1.)बालकों को संख्या की भाषा, संख्या-प्रत्ययों तथा संख्या-प्रतीकों का ज्ञान देना तथा जीवन में उनका सफल उपयोग करने की योग्यता पैदा करना।
(2.)बालकों में संख्या, समय तथा स्थान से सम्बंधित स्पष्ट विचार करने की योग्यता पैदा करना।
(3.)बालकों में गणित सम्बन्धी विचारों का प्रयोग तथा तर्क करने की शक्ति उत्पन्न करना।
(4.)बालकों में अंकगणित सम्बन्धी कथनों को ठीक प्रकार समझने तथा उनका विश्लेषण कर सही निष्कर्ष ज्ञात करने की क्षमता पैदा करना।
(5.)बालकों में अंकगणित सम्बन्धी व्यावहारिक समस्याओं को हल करने की योग्यता पैदा करना। कम्प्यूटर का उपयोग करने की क्षमता पैदा करना।
(6.)बालकों में मात्रा (Quantity), संख्या (Numbers), दूरी (Distance) तथा भार (weight) का सही अनुमान लगाने की योग्यता पैदा करना।
(7.)बालकों में अंकगणित के आधारभूत सिद्धान्तों को उपयोग में लाने की योग्यता पैदा करना। संख्याओं को संख्या रेखा एवं ज्यामितीय आकृतियों द्वारा समझने की क्षमता का विकास करना।
(8.)बालकों में शीघ्रता एवं शुद्धता से गणना करने की योग्यता उत्पन्न करना।
(9.)बालकों में विचार-शक्ति, तर्क-शक्ति एवं निर्णय-शक्ति का विकास करना।
(10.)बालकों में स्वच्छता, शुद्धता एवं नियमित रूप से कार्य करने की आदत डालना।
(11.)बालकों के संख्या-ज्ञान को बीजगणित तथा रेखागणित के अध्ययन के लिए आधार बनाना। संख्या रेखा की विशेषताओं का ज्ञान देना।

4.बालकों में निम्नलिखित गुणों का विकास करना(Develop the following qualities in children) -

(1.)समय का पाबन्द होना।
(2.)खर्च और आमदनी में सामंजस्य स्थापित कर प्रति माह बचत करना। खर्च और आमदनी का बजट बनाना। कम खर्च करने की आदत डालना।
(3.)वस्तुओं का लाभ से क्रय-विक्रय करना तथा बाजार भावों का अध्ययन करना।
(4.)डाकखानों या बैंक में बचत खाता खोलकर धन जमा करना।
(5.)व्यापार करते समय उन घटकों का अध्ययन करना जिनका व्यापार पर प्रभाव पड़ता है।
(6.)वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि एवं गिरावट के कारणों को समझने के प्रयास करना।
(7.) वर्तमान अर्थव्यवस्था का अध्ययन करना तथा इसकी जटिलता को अंकगणित के सिद्धान्तों के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करना।
(8.)जीवन बीमा के महत्व को समझना।
(9.)वर्तमान कर प्रणालियों का अध्ययन करना तथा कर की गणना करना।
(10.)राष्ट्र की आर्थिक नीतियों को सयझकर देश के विकास में योग देना।
(11.)सही संख्यात्मक अनुमान लगाना।
(12.)ज्यामितीय आकृतियों द्वारा संख्याओं को चित्रित करना।

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