Mathematics Teacher in Hindi ||गणित अध्यापक

Mathematics Teacher 

गणित अध्यापक(Mathematics Teacher)

Mathematics Teacher

Mathematics Teacher 

आधुनिक युग में पाठ्यक्रम, विद्यार्थी तथा अध्यापक तीनों का शिक्षण कार्य में महत्वपूर्ण स्थान तथा महत्त्व है. परन्तु इन तीनों में अध्यापक का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि विद्यार्थी को पाठ्यक्रम व विषयवस्तु को समझाने और प्रस्तुत करने का दायित्व अध्यापक का ही होता है. प्रत्येक अध्यापक में कुछ न कुछ गुण व विशेषताएं अवश्य होनी चाहिए ताकि उस विषय को पढ़ने में विद्यार्थी रुचि ले सके. परन्तु गणित विषय अन्य विषयों की तुलना में अत्यधिक जटिल विषय है तथा उसको समझाने, समझने के लिए उच्च स्तर की तार्किक क्षमता, चिंतन, कल्पना शक्ति तथा निर्णय शक्ति की आवश्यकता होती है.
गणित एक ऐसा विषय है जिसके अध्ययन के लिए शिक्षक में उक्त गुणों के साथ साथ उच्च बौद्धिक क्षमता, धैर्य, एकाग्रता, समर्पण भाव की आवश्यकता होती है. गणित शिक्षक(Mathematics Teacher) में यदि सूझबूझ, विषय का गहराई से ज्ञान, छात्रों की कठिनाइयों से परिचित हो तो वह गणित को अत्यंत रोचक बना सकता है तथा छात्रों में तार्किक क्षमता एवं मानसिक शक्ति का विकास कर सकता है. इसके अतिरिक्त गणित के शिक्षक में सफल शिक्षण के लिए निम्न गुणों का होना आवश्यक है -

(1.)गणित विषय का गहराई से ज्ञान (Deep knowledge of Mathematics):- 

आज का युग तकनीकी युग है अतः विषय सामग्री में नयी नयी खोजे हो रही है तथा पाठ्यक्रमों में निरन्तर परिवर्तन कर दिया जाता है. अतः गणित अध्यापक को विषय का गहराई से तभी ज्ञान हो सकता है जबकि उसकी अध्ययन की प्रवृत्ति हो तथा नवीन ज्ञान सीखने की रूचि हो. इसलिए गणित अध्यापक को नई नई पुस्तकें, पत्रिकाओं को पढ़ते रहना चाहिए और ज्ञान व जानकारी में uptodate रहना चाहिए.
(2.) सकारात्मक दृष्टिकोण(Positive perspective): - 

यदि गणित के प्रति अध्यापक का सकारात्मक दृष्टिकोण होगा तो अध्यापक गणित को आवश्यक, उपयोगी एवं महत्वपूर्ण बना सकता है. विद्यार्थियों का सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर सकता है.
(3.)व्यावसायिक दृष्टिकोण(Professional perspective) :- 

आज का युग आर्थिक, तकनीकी और वैज्ञानिक युग है अतः गणित तथा विज्ञान का देश के आर्थिक, तकनीकी और विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण योगदान है. अतः जो अथ्यापक गणित को पढ़ाना मजबूरी समझते हैं वे विद्यार्थियों की गणित विषय में रुचि जाग्रत नहीं कर सकते हैं जिन अध्यापकों की अपने व्यवसाय में निष्ठा होती है वे अपने कार्य को कर्मठता से करते हैं वे विद्यार्थियों में अध्ययन के प्रति रूचि उत्पन्न कर देते हैं.
(4.)गणित को पढ़ाने का अनुभव(Experience to Teach Mathematics) :-

जिन अध्यापकों को गणित पढ़ाने का अनुभव होता है वे गणित विषय को सरल रुप में विद्यार्थियों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं. यदि अध्यापक को अनुभव नहीं होता है तो तो अध्यापक की त्रुटियों का विद्यार्थियों के सीखने पर प्रभाव पड़ता है. इसलिए गणित के शिक्षक को व्यापक और गहरा ज्ञान होना चाहिए तथा हमेशा ज्ञान ग्रहण करते रहना चाहिए.
(5.)अन्य विषयों का ज्ञान(Knowledge of Other Subjects) :- 

गणित का सम्बन्ध अन्य विषयों से भी होता है. जैसे रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान इत्यादि. अतः विद्यार्थी अन्य विषयों से संबंधित प्रश्न पूछे तो उसका समाधान करना चाहिए. भौतिक विषयों के अतिरिक्त नैतिक, धार्मिक व आध्यात्मिक पुस्तकों का ज्ञान भी होना चाहिए जिससे विद्यार्थियों के जीवन से सम्बंधित समस्याओं का समाधान कर सके.

(6.)मनोविज्ञान का ज्ञान (Knowledge of Psychology):-

गणित के शिक्षक को मनोविज्ञान का व्यावहारिक ज्ञान भी आवश्यक है क्योंकि एक ही कक्षा में विभिन्न बौद्धिक स्तर के विद्यार्थी होते हैं. किसी विद्यार्थी को संक्षेप में समझ में आ जाता है तथा किसी को विस्तृत रूप से समझाने पर समझ में आता है. प्रत्येक विद्यार्थी के सीखने की मानसिक क्षमता अथवा स्तर समान नहीं होता है. अतः अधिक मेधावी, मध्यम तथा मन्दबुद्धि बालकों की पढ़ने में रूचि का विकास तभी किया जा सकता है जबकि अध्यापक को मनोविज्ञान का ज्ञान होगा.
(7.)सदाचार युक्त जीवन(Life containing Virtue) :- 

गणित के शिक्षक का जीवन सदाचार युक्त होगा अर्थात् शिक्षक का जीवन पवित्र, शुद्ध, विनम्रता युक्त, धैर्यवान्, साहसी, विवेकवान इत्यादि गुण होंगे तो विद्यार्थियों को प्रभावी ढंग से शिक्षण कार्य करायेगा. यो ये गुण अन्य विषय के अध्यापक में भी मौजूद होते हैं परन्तु गणित जैसे जटिल विषय के पढ़ाने वाले अध्यापक में ये गुण आवश्यक रूप से होने चाहिए विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए प्रेरणा मिले.

(8.)गणित के व्यावहारिक ज्ञान की जानकारी(Practical Knowledge of Mathematics) :-

गणित का व्यवहार में कहाँ-कहाँ किस रूप में प्रयोग किया जाता या किया जा सकता है। जैसे घर का बजट बनाने, आय, मजदूरी, वस्तुओं के तौलते समय, घड़ी में समय देखते समय, बस का किराया देते समय, गणना करने में या अनुपात औसत निकालते समय इत्यादि विभिन्न कार्यों में गणित का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार का ज्ञान होने से छात्रों को उसकी व्यावहारिक उपयोगिता बताई जा सकती है।

(9.)नवीन तकनीकी का ज्ञान (Knowledge of new Technology):-

विश्व के नागरिकों को निकट लाने में तकनीकी ज्ञान की आज के युग में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। आज तकनीकी ज्ञान के बिना कल्पना भी नहीं की जा सकती है। गणित के ज्ञान के प्रसार का लैपटॉप, मोबाइल, कम्प्यूटर व इंटरनेट के माध्यम से आसानी से हो तथा तीव्र गति से हो रहा है। शिक्षक घर बैठे कई समस्याओं का समाधान इनके माध्यम से छात्रों को आसानी से कभी भी, कहीं पर भी उपलब्ध करा सकता है। आज समाज की आर्थिक प्रगति तकनीकी ज्ञान पर निर्भर करती है जिसके कारण हमें जीवन में आनन्द, सुख और समृद्धि उपलब्ध हो सकता है। भावी जीवन में भी गणित के अधिक उपयोग की सम्भावना है।

(10.)गणित की शिक्षण विधियों का ज्ञान(Knowledge of Mathematics Teaching Method) :- 

गणित के अध्यापक को गणित के ज्ञान के साथ-साथ गणित की अध्यापन विधियों जैसे आगमन-निगमन विधि ( Inductive-Deductive method), संश्लेषण-विश्लेषण (synthetic-analytic method), अनुसंधान विधि (Heuristic method), प्रयोगशाला विधि ( Laboratory method), समस्या निवारण विधि (problem solving method) का ज्ञान होना आवश्यक है. अक्सर गणित की विषय सामग्री का ज्ञान तो होता है परन्तु विधि का ज्ञान न होने से गणित का अध्यापक पारम्परिक तरीके से गणित को पढ़ाते हैं. गणित के अध्यापक को यह ज्ञात होना चाहिए कि किस गणित तथा किस समस्या में कौनसी विधि का प्रयोग उचित होगा. यदि इसका ज्ञान होगा और उसका प्रयोग करेगा तभी वह शिक्षण में सफल हो सकेगा.







वस्तुतः गणित की अनेक शाखाएं जैसे बीजगणित, अंकगणित, ज्यामिति, त्रिकोणमिति इत्यादि इन सभी का गणित के अध्यापक को अध्यापन कराना होता है परन्तु इनकी विषय सामग्री में आपस में ज्यादा समानता नहीं है.इसलिए उसको समझना होगा कि गणित की किस शाखा में कौनसी विधि उपयुक्त रहेगी. गणित के अध्यापक(Mathematics Teacher) को यह ध्यान रखना होगा कि विद्यार्थियों के मस्तिष्क में यह विचार पैदा नहीं होने देना चाहिए कि इनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है बल्कि उसे यह अनुभव कराना चाहिए कि इनका आपस में सम्बन्ध है तथा इन सभी का ज्ञान आवश्यक है.


(11.)मूल्यांकन विधि(Evaluation method):-


गणित के अध्यापक को मूल्यांकन विधियों का भी ज्ञान होना आवश्यक है. शिक्षण तथा मूल्यांकन का आपस में गहरा सम्बन्ध है. मूल्यांकन विधियों यथा वस्तुनिष्ठ, निबन्धात्मक, लघुत्तरात्मक व अतिलघुत्तरात्मक विधियों से विद्यार्थियों का समय-समय पर मूल्यांकन करते रहना चाहिए.




(12.)कक्षा अध्यापन((Class Teaching):-

 गणित के अध्यापक को यह ध्यान रखना चाहिए कि अन्य विषयों का तो विद्यार्थी घर पर भी अध्ययन कर सकता है तथा बिना किसी सहायता के अध्ययन के लिए सहायक की जरूरत होती है. वह सहायक शिक्षक ही हो सकता है. अतः गणित के अध्यापक को गणित की समस्याओं का अभ्यास भली प्रकार करा देना चाहिए उसे घर के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए. क्योंकि गणित केवल गणना करने का कार्य नहीं है बल्कि इसमें अमूर्त चिंतन की आवश्यकता होती है, बिना चिंतन के गणित को सीखना कठिन है.






(13.)गणित का व्यावहारिक ज्ञान(Practical Knowledge of Mathematics) :-

 गणित ज्ञान का एक साधन है, साध्य नहीं. पूर्व में गणित का व्यावहारिक प्रयोग जोड़, बाकी, गुणा और भाग तक ही सीमित था परन्तु आधुनिक युग में तकनीकी तथा गणित का इतना विकास हो चुका है कि हमे ब्याज, लाभ-हानि, समय, मजदूरी, अनुपात-समानुपात, बीमा इत्यादि की गणना करने की व्यावहारिक आवश्यकता होती है. गणित के अध्यापक से यह अपेक्षा की जाती हैं कि वह विद्यार्थियों को इनका समुचित ज्ञान कराए जिससे गणित का व्यावहारिक समस्याओं को हल करने में विद्यार्थी उपयोग कर सके.







(14.)गणित के अध्यापक का चरित्र(Character of Mathematics Teacher) :- 

गणित के अध्यापक की गणित में गहरी निष्ठा होना आवश्यक है क्योंकि इसका प्रभाव विद्यार्थी पर पड़ता है. विद्यार्थियों को गणित सीखने तथा रूचि पैदा करने के लिए गणित के अध्यापक में धैर्य, समय का पाबन्द, शुद्धता, सरलता, परिश्रमी, एकाग्रता जैसे गुणों का होना आवश्यक है.
(15.)प्रसिद्ध गणितज्ञों की जानकारी(Information of famous Mathematicians) :- 

गणित के अध्यापक को भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञों जैसे आर्यभट्ट (प्रथम), आर्यभट्ट (द्वितीय), वराहमिहिर, 

महावीराचार्य, भास्कराचार्य तथा विश्व के महान गणितज्ञ पाइथागोरस, यूक्लिड, रिनि डिकार्टी के बारे बारे में 

ज्ञान होना चाहिए. भारतीय गणितज्ञों ने शून्य, अनन्त, दशमलव प्रणाली, समाकलन गणित, लघुगुणक व संख्या पद्धति का ज्ञान कराया. "इससे विद्यार्थियों को प्रेरणा मिलती है.


(16.)अन्य ज्ञान(Other Knowledge) :-
(1.)वर्तमान पाठ्यक्रम को नवीन विधियों एवं आवश्यकताओं के अनुसार विद्यार्थियों को गणित का अध्यापन कराया जाना चाहिए.
 (2.)गणित पढ़ने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थी अक्सर इंजीनियरिंग, कंप्यूटर टेक्नोलाॅजी, भौतिकशास्त्र जैसे क्षेत्रों में चले जाते हैं और गणित में मध्यम दर्जे के विद्यार्थी रह जाते हैं. अतः गणित के शिक्षक को अपने प्रयासो द्वारा विद्यार्थियों को अनुसंधान (खोज) एवं नवीन चिंतन की ओर प्रेरित करे.
 (3.)गणित के अध्यापक को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उसका अध्यापन का ढंग ऐसा हो जिससे भावी गणितज्ञ तैयार हो सके और हमारी तकनीकी व गणित सम्बन्धी विकास में अपना योगदान दे सकें.






(17.)समीक्षा(Criticism) :- 

गणित का सफल अध्यापक वही हो सकता है जिसमें ज्ञान की हमेशा प्यास हो, जीवन में सादगी हो। अध्यात्म, नैतिकता व सदाचरण से युक्त जीवन हो। वस्तुतः अध्यात्म व गणित (विज्ञान) एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों के ज्ञान से व्यक्ति में पूर्णता आती है। ऐसा अध्यापक ही छात्रों को गणित विषय में रूचि का विकास कर सकता है व प्रेरित कर सकता है शर्त यही है कि अध्यापक के सिद्धांत और व्यवहार में अन्तर न हो। कई शिक्षकों को गणित का गहरा और विशद ज्ञान होता है परन्तु उनका चरित्र उज्ज्वल नहीं होता है, छात्रों पर ऐसे अध्यापक का विपरीत प्रभाव पड़ता है। अध्यापक का शुद्ध व पवित्र आचरण छात्रों को वैसा ही करने को प्रेरित करता है।

(18.)निष्कर्ष(Conclusion and suggestion) :- 

वर्तमान में गणित अध्यापकों की दशा बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है. वैसे तो वर्तमान दृश्य को देखकर कहा जा सकता है कि आज की स्थिति में कोई भी अध्यापक स्वेच्छा से बनने के लिए तैयार नहीं होता है. वह अध्यापक तभी बनता है जब अन्य व्यवसाय जैसे इंजीनियर, डाॅक्टर, प्रशासनिक अधिकारी (R.A.S,I.AS)तथा इसी प्रकार की अन्य सेवाओं में उसका चयन नहीं होता है. इस प्रकार अधिक योग्य प्रतिभाएं अन्य क्षेत्रों में चली जाती है और निम्न स्तर की प्रतिभाएं अध्यापक व्यवसाय का चयन करती हैं. इस प्रकार जो मनुष्य अनिच्छा से अध्यापक व्यवसाय का चयन करता हैं तो वह विद्यार्थियों को रुचिपूर्वक नहीं पढ़ाता है और न ही उसमें उस विषय का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है. इसके अलावा महानगरों में जो गणित के अध्यापक नियुक्त हैं वे गाँवों में जाना पसन्द ही नहीं करते हैं क्योंकि नगरों तथा महानगरों में प्राइवेट ट्यूशन कराकर वे और अधिक धन कमाने की लालसा रखते हैं. अतः इसका समाधान यह हो सकता है कि अध्यापक व्यवसाय विशेषकर गणित में योग्य तथा इच्छुक अभ्यर्थियों की ही नियुक्ति की जाए. इसके साथ ही गणित अध्यापक का वेतनमान सरकार तथा शिक्षा संस्थानों को उनकी योग्यता के अनुसार दिया जाना चाहिए जिससे वे ट्यूशन की ओर ध्यान न देकर कक्षा में ही विद्यार्थियों को पूर्ण समर्पण, एकाग्रता तथा परिश्रम के साथ अध्ययन कराएँ.
 


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